Thursday, March 12, 2015

अकेले अकेले जीते रहना भी कितना मुश्किल है ,
अकेले अकेले आँहें भरना भी कितना मुश्किल है ,

चार दीवारों और एक छत के सहारे भी जीना कितना मुश्किल है,
इन नीरस दीवारों से बात करना भी कितना मुश्किल है ,

मेरा दुःख दर्द इन दीवारों ने सब सुना, पर रास्ता दिखाने से मुह फेर दिया,
शायद ये भी समझते हैं अकेले अकेले खड़ा रहना भी कितना मुश्किल है।

उम्मीद के साथ दीवारों पर लेटी छत की तरफ देखा पर उसने भी रुसवा कर दिया,
शायद वो भी समझती है बिना किसी के साथ के ये आशियाना भी कितना बेबस है।

कुछ यादों में बसे लोगो  को याद करना चाहा पर इतना मुश्किल था की में ना समझा ,
अकेले अकेले यादें सजोयें रखना और फिर उन्हें याद करना भी कितना मुश्किल है।

कहीं तो अब ये बेजान दीवारें भी मुझसे छुपकर आंशू बहा रही होंगी मेरी इस पीड़ा पर।
शायद मुझे छोड़कर अकेले अकेले खड़े रहने का गम उन्हें भी है।

अकेले अकेले ये जिंदगी भी कितनी मुश्किल है ,


अकेले अकेले जीते रहना भी कितना मुश्किल है ,
अकेले अकेले आँहें भरना भी कितना मुश्किल है ,




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