Tuesday, June 3, 2014

शायद तुम भी मुझसे प्यार करती हो।

सोच-सोच के में अपने मन को मना लेता हूँ, शायद तुम मुझसे प्यार नहीं करती हो।
तुम जब देखती हो और तुम्हारी मुस्कान जो तुम्हारे पूरे चहरे के तेज़ को बढ़ाती है..
फिर सोचता हूँ शायद तुम भी मुझसे प्यार करती हो।

दूर से ही जब तुम्हे देखता हूँ तुम्हारी बेचैन निगाँहें मद मस्त हिरनी की तरह अटखेलियां करती हें.
मानो ऐंसा लगता है वो भी भीड़ में मुझे ही ढूंढ रही हों। …।
इतना ही काफी है मुझे अहसास दिलाने के लिए शायद तुम भी मुझसे प्यार करती हो.

किसी और के साथ जब तुम बातें करती हो और नज़रों को किसी और का इन्तजार रहता है.
ये एक शक बढ़ता है शायद किसी और का इंतज़ार ये नज़रें करती हें.
फिर सोचता हूँ शायद तुम मुझसे प्यार नहीं करती।

जब तुम्हारे धीमी सी मन में कही आवाज को में सुनता हूँ .
फिर अहसास होता है तुम्हारी नज़रें मेरा ही इंतज़ार करती हें.
फिर सोचता हूँ शायद तुम मुझसे ही प्यार करती हो..

एक अनजान सा बनकर में जब तुम्हारे पास आने की कोशिश करता हूँ.
और कुछ ना बोल कर जब तुम अनजान बनकर बात को शुरू करती हो।
फिर सोचता हूँ हम दोनों तो एक दूसरे से प्यार करते हैं।

इशारो ही इशारो में जब बातें हो जाती हें. और तुम नज़रें झुकाकर मुस्करा कर चली जाती हो।
और जब में ये देख कर अपनी ख़ुशी रोक ना पाता हूँ और मुस्करा जाता हूँ.
फिर सोचता हूँ हम दोनों तो एक दूसरे से प्यार करते हैं।

में हर दिन तुम्हारा ही इंतज़ार करता हूँ. जब तुम्हारी इक झलक से मुस्कराने लगता हूँ।
फिर सोचता  हूँ शायद में भी तुमसे प्यार करता हूँ..

शायद तुम भी मुझसे प्यार करती हो।
शायद तुम भी मुझसे प्यार करती हो।   

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