Monday, May 26, 2014

विदा ले लूँ  में अब इस करीबी से..

कितने  करीब थे तुम मेरे जो में ठीक से देख सकता था ,
कितने करीब थे तुम मेरे जो में  तुम्हे महसूस  कर सकता था ।

कभी मैंने ना सोचा था इतने करीब आने को.
जो करीब आये तो नज़रें पास होती चली गयी..

मन भी था खाली-खाली, दिल भी था खाली-खाली,
क्यों ये कजरारे नैने मन और दिल में घर कर गये.

ना जाने कोई दुश्मन था जो तुम्हे इतने करीब लाया।
ना जाने कोई इतफ़ाक था जो तुम इतने करीब आये.

सपने बुनने लगे जो तुम करीब से करीबी होते चले गये.
सपनो को छुपाने लगा कहीं गैरों के हाथो ये बिखर न जाएं.

अब तो सपनो में भी तुम्हे दुनिया से छुपाने लगा.
डरता था कोई इस करीबी को दूरियों में ना बदल दे.

ना पता था एक दिन इस भंवरे को उड़ना है. फूल माली को तोडना है.
बाग मैं फूल न था, भंवरा उड़ता ही रहा. फिर कहीं आसमान में खो गया.

अब वक़्त हो चला था करीबी से दूरियां बढ़ाने का.
सोचा अब विदा ले लूँ  इस करीबी से, विदा ले लूँ  इस करीबी से.

विदा ले लूँ  में अब इस करीबी से....

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