Sunday, September 1, 2013

वक़्त की गहराईयों ने मुझे कहीं छुपा दिया
और वक़्त की तन्हाईयों ने मुझको कहीं भुला दिया।

वक़्त के इस खेल का माजरा ही समझ में ना आ रहा,
जो वक़्त के इस खेल में में  भी शामिल हो जाऊं।

वक़्त बेवक्त ये वक़्त की मार…
अब सहन छमता से बाहर हो चली।

ना जाने कहाँ जाके ये वक़्त ठहर जाए...
और मेरी पीड़ा को भी समझे।।।

क्यों में ही हमेशा वक़्त को समझूं,,,
एक आश है दिल में क्या पता वक़्त भी समझना शुरु कर दे मुझको। ।

वक़्त ने ही जीना सिखाया और वक़्त ने ही सहना सिखया.
ना जाने कब एक दिन वक़्त छोड़ना भी सिखा दे।

वक़्त की इस भूल भुलिया में कहीं घूमता रह गया हूँ में…
ना जाने वक़्त कब भूल भुलिया में भी  सीधा चलना सिखा दे।

ये तो वक़्त का ही खेल जो खुद की तन्हाईयों में खुद को ही भूल गया…
और ये तन्हाईयाँ भी वक़्त की हें।

ये सब वक़्त का ही खेल…
और इसी खेल का में भी एक खिलौना हूँ। .
ये भी एक वक़्त है।


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