Monday, June 3, 2013

वो नकाब लगा कर खुद को इश्क से महफोज़  समझते ,
इतना भी नहीं  समझे इश्क चहरे से नहीं नजरो से शुरू होता है .


वो जुबान बंद रखकर खुद को इश्क में बेजुबान समझते ,
इतना भी नहीं समझे इश्क जुबान की नहीं नजरो की बात समझता है ..

वो ओंठों  को बुत बनाकर ओंठो को इश्क से महरूम रखते,
इतना भी नही  समझे इश्क ओंठो की नहीं नजरो के इशारे समझता है ..

वो दबे पाऊँ चलकर इश्क की चोखट पर दस्तक  से खुद को दूर समझते  ,
इतना भी नही  समझे इश्क पाओं  की  आवाज नहीं दिल की धडकनों को सुनता है ..

वो नकाब लगा कर खुद को इश्क से महफोज़  समझते ,
इतना भी नहीं समझे इश्क चहरे से नहीं नजरो से शुरू होता है .

वो नींद में होने का बहाना करके नज़रों को इश्क से छुपाते ,
इतना भी नहीं  समझे नज़रें ना  मिली इश्क चेहरे के भाव भी समझ लेता है ..

वो कानो को  बंद रखकर कुछ ना सुनने का बहाना करके  खुश होते .
इतना भी नहीं  समझे इश्क की कोई जुबां नहीं होती है ...

वो ना देखने का बहाना करके इश्क  को अनदेखा समझते .
इतना भी  नहीं  समझे ये तो इश्क की ही  फितरत है ..  

वो नकाब लगा कर खुद को इश्क से महफोज़  समझते ,
इतना भी नहीं  समझे इश्क चहरे से नहीं नजरो से शुरू होता है .

इश्क तो नज़रों से शुरू होता है .... 

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