Saturday, March 20, 2010

बेजान सा पड़ा  हूँ ,
एक अनजान सा पड़ा हूँ  .
ना मुह में लब्ज हैं ना लब्जों में जान है,
दिल में अरमानो का सेलाब  है ,
जो बहार आने को बेताब है .
ना जाने क्यों रोक रहा हूँ ........

बेजान सा पड़ा हूँ, एक अनजान सा पड़ा हूँ.
आसमां छूना  है सोच रहा हूँ ,
रास्ता कहाँ है दूंढ रहा हूँ .
सब लोगों से पूछता  फिर रहा हूँ .
बताते सब लोग रास्ता मुझको,
रास्तों के जाल के बीच में खड़ा हूँ ,
सोच रहा किस पथ पर में जाऊं,

बेजान सा पड़ा हूँ , एक अनजान सा पड़ा हूँ .
बैठ - बैठ कर सोच रहा हूँ ,
अपनी मंजिल को खोज रहा हूँ ,
क्या जाने याद आये मुझे मेरी मंजिल दुबारा ,
जिसे  में भूल सा गया हूँ .

बेजान सा पड़ा हूँ , एक अनजान सा पड़ा हूँ .
इस जंजाल में कहीं खो सा गया हूँ ,
में अपनी पहचान को कहीं छोड़ सा गया हूँ ,
में इस भंवर  में डूब सा गया हूँ ,
बाहर आने की कोशिश में में थक सा गया हूँ ,

बेजान सा पड़ा हूँ , एक अनजान सा पड़ा हूँ.
जाना है बहुत दूर तैयारी में जुटा हूँ ,
तैयारी कुछ अधूरी  सी लग रही है ,
ना जाने क्या कमी खल रही है .

बेजान सा पड़ा हूँ , एक अनजान सा पड़ा हूँ .
जाना है बहुत दूर इस सोच में पड़ा हूँ .

3 comments:

वन्दना said...

अगर मनुष्य अपने लक्ष्य को जान ले तो जीना आसान हो जाये………………सुन्दर प्रस्तुति।

त्रिलोचन भट्ट said...

achcha prayas kar rahe ho pawan, Mera sadhuwad

Anonymous said...

hi,very nice i want more like this i also want you

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